मैने पिताजी को राजनिति मे देखा, समाज के कमजोर वर्ग के लोगो के समकक्ष खडा पाया उन्हे । पिताजी कि मर्जी थी कि मै राजनिति ना करु, क्यो कि इसमे झुठ का सहारा लेना पडता है, इसलिए मैने दुसरा रास्ता चुना पत्रकारिता/ लेखन/ अध्यापन/ और तेरापन्थ के दशम आचार्यश्री महाप्रज्ञ के जिवन -विज्ञान, अणुव्रत आन्दोलन, और साहित्या जगत कि उनकि रचनाओ एवम अनमोल साहियत्य को लोगो के समक्ष प्रसतुत करना।